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ध्यानयोग
ध्यानयोगः · Dhyāna-yoga · 47 श्लोक
ई कृष्णक ध्यानक लेल व्यावहारिक निर्देश अछि। ओ बतबैत छथि जे मनुष्य स्वयं अपन सभसँ नीक मित्र वा सभसँ पैघ शत्रु भ’ सकैत अछि, फेर स्थान, आसन, आहार, निद्रा आ प्रयासक वर्णन करैत छथि जे स्थिर साधनामे सहायक अछि, आ ओहि शांतिक जे वायुरहित स्थानमे दीप जकाँ अबैत अछि। अर्जुन ओ सच्चा प्रश्न पुछैत छथि जे हर साधकक मनमे अबैत अछि: मन चंचल अछि, तँ जँ हम असफल भेलहुँ तँ? कृष्णक आश्वासन अछि जे कोनो सच्चा प्रयास कहियो व्यर्थ नहि जाइत अछि।
परंपरामे एकरा चंद्र, जे मनक ग्रह अछि, आ शनि, जे अनुशासनक ग्रह अछि, तथा आंतरिक शांतिक चतुर्थ भावसँ जोड़ल जाइत अछि। एकरा चंद्रक दशा वा चतुर्थ भाव पर कठिन गोचरमे पढ़ल जाइत अछि, जखन मन टिकैत नहि अछि। अध्यायक संदेश अछि जे स्थिरता संयम आ धैर्यपूर्वक अभ्याससँ बनैत अछि, बलपूर्वक नहि। ई चिंतनक अभ्यास अछि, भविष्यवाणी नहि।
श्रीभगवानुवाच
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥
śrībhagavānuvāca
anāśritaḥ karmaphalaṃ kāryaṃ karma karoti yaḥ |
sa saṃnyāsī ca yogī ca na niragnirna cākriyaḥ ||
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।
न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥
yaṃ saṃnyāsamiti prāhuryogaṃ taṃ viddhi pāṇḍava |
na hyasaṃnyastasaṅkalpo yogī bhavati kaścana ||
कृष्ण कहैत छथि: जे कर्मफलक आश्रय नहि लक’ कर्तव्य कर्म करैत अछि, सएह संन्यासी आ योगी अछि, मात्र अग्नि आ क्रियाक त्याग करऽ बला नहि। जकरा संन्यास कहैत अछि, तकरे योग जानू, किएक तँ संकल्पक त्यागक बिना केओ योगी नहि होइत अछि।
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥
ārurukṣormuneryogaṃ karma kāraṇamucyate |
yogārūḍhasya tasyaiva śamaḥ kāraṇamucyate ||
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥
yadā hi nendriyārtheṣu na karmasvanuṣajjate |
sarvasaṅkalpasaṃnyāsī yogārūḍhastadocyate ||
योग पर चढ़बाक इच्छा रखनिहार मुनिक लेल कर्म साधन कहल गेल अछि; योग पर आरूढ़ भेला पर शांतिए साधन कहल गेल अछि। जखन मनुष्य ने इंद्रियक विषयमे, ने कर्ममे आसक्त होइत अछि आ सभ संकल्पक त्याग क’ दैत अछि, तखन ओ योगारूढ़ कहबैत अछि।
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥
uddharedātmanātmānaṃ nātmānamavasādayet |
ātmaiva hyātmano bandhurātmaiva ripurātmanaḥ ||
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥
bandhurātmātmanastasya yenātmaivātmanā jitaḥ |
anātmanastu śatrutve vartetātmaiva śatruvat ||
अपनहि द्वारा अपन उद्धार करू, अपनाकेँ खसऽ नहि दिअ; किएक तँ आत्मा आत्माक मित्र अछि आ आत्मा आत्माक शत्रु। जे अपनाकेँ जीति लेने अछि, तकर आत्मा ओकर मित्र अछि; जे नहि जितलक, तकरा लेल वएह शत्रु जकाँ बरतैत अछि।
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥
jitātmanaḥ praśāntasya paramātmā samāhitaḥ |
śītoṣṇasukhaduḥkheṣu tathā mānāpamānayoḥ ||
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः ।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥
jñānavijñānatṛptātmā kūṭastho vijitendriyaḥ |
yukta ityucyate yogī samaloṣṭāśmakāñcanaḥ ||
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥
suhṛnmitrāryudāsīnamadhyasthadveṣyabandhuṣu |
sādhuṣvapi ca pāpeṣu samabuddhirviśiṣyate ||
जे आत्माकेँ जीति लेने अछि आ जे शांत अछि, तकरा लेल परमात्मा सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख आ मान-अपमानमे सम रहैत अछि। ज्ञान आ विज्ञानसँ तृप्त, अविचल आ इंद्रियजयी योगी, जकरा लेल माटि, पाथर आ सोना समान अछि, युक्त कहल जाइत अछि। जे सुहृद, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेषी, बंधु, साधु आ पापी सभमे सेहो समबुद्धि रखैत अछि, से विशिष्ट अछि।
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥
yogī yuñjīta satatamātmānaṃ rahasi sthitaḥ |
ekākī yatacittātmā nirāśīraparigrahaḥ ||
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥
śucau deśe pratiṣṭhāpya sthiramāsanamātmanaḥ |
nātyucchritaṃ nātinīcaṃ cailājinakuśottaram ||
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥
tatraikāgraṃ manaḥ kṛtvā yatacittendriyakriyaḥ |
upaviśyāsane yuñjyādyogamātmaviśuddhaye ||
योगीकेँ चाही जे ओ एकांतमे असगरे बैसि, मन आ शरीरकेँ वशमे रखि, आशा आ परिग्रहसँ रहित भ’ निरंतर मनकेँ लगाबथि। शुद्ध स्थानमे, ने बहुत ऊँच ने बहुत नीच, कुश, मृगचर्म आ वस्त्र बिछाक’ अपन स्थिर आसन बनाबथि। ओहि आसन पर बैसि मनकेँ एकाग्र क’ क’, चित्त आ इंद्रियक क्रियाकेँ वशमे रखैत आत्मशुद्धिक लेल योगक अभ्यास करथि।
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥
samaṃ kāyaśirogrīvaṃ dhārayannacalaṃ sthiraḥ |
samprekṣya nāsikāgraṃ svaṃ diśaścānavalokayan ||
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥
praśāntātmā vigatabhīrbrahmacārivrate sthitaḥ |
manaḥ saṃyamya maccitto yukta āsīta matparaḥ ||
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः ।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥
yuñjannevaṃ sadātmānaṃ yogī niyatamānasaḥ |
śāntiṃ nirvāṇaparamāṃ matsaṃsthāmadhigacchati ||
शरीर, माथ आ गरदनकेँ सोझ आ अचल धारण क’ क’, एम्हर-ओम्हर नहि देखैत नासिकाक अग्रभाग पर दृष्टि जमाक’, शांत, निर्भय, ब्रह्मचर्य-व्रतमे स्थित, मनकेँ वशमे क’ क’, हमरामे चित्त लगाबथि, हमरा परायण भ’ बैसथि। एहि तरहेँ सदिखन आत्माकेँ योगमे लगबैत संयत मन बला योगी हमरामे स्थित परम निर्वाण रूप शांति प्राप्त करैत अछि।
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥
nātyaśnatastu yogo’sti na caikāntamanaśnataḥ |
na cātisvapnaśīlasya jāgrato naiva cārjuna ||
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥
yuktāhāravihārasya yuktaceṣṭasya karmasu |
yuktasvapnāvabodhasya yogo bhavati duḥkhahā ||
ई योग ने बहुत खाइबलाक, ने बिल्कुल नहि खाइबलाक, ने बहुत सुतऽ बलाक आ ने बहुत जगऽ बलाक सिद्ध होइत अछि। जकर आहार-विहार संयमित अछि, जकर कर्मचेष्टा संयमित अछि आ जकर सुतब-जगब संयमित अछि, तकरा लेल योग दुःखक नाश करऽ बला होइत अछि।
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥
yadā viniyataṃ cittamātmanyevāvatiṣṭhate |
niḥspṛhaḥ sarvakāmebhyo yukta ityucyate tadā ||
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥
yathā dīpo nivātastho neṅgate sopamā smṛtā |
yogino yatacittasya yuñjato yogamātmanaḥ ||
जखन संयत चित्त आत्मामे नीकसँ स्थित भ’ जाइत अछि आ सभ कामनासँ निःस्पृह भ’ जाइत अछि, तखन ओ पुरुष युक्त कहबैत अछि। जेना वायुरहित स्थानमे राखल दीप हिलैत नहि अछि, वएह उपमा आत्माक योगक अभ्यास करऽ बला संयत चित्त बला योगीक कहल गेल अछि।
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥
yatroparamate cittaṃ niruddhaṃ yogasevayā |
yatra caivātmanātmānaṃ paśyannātmani tuṣyati ||
सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥
sukhamātyantikaṃ yattad buddhigrāhyamatīndriyam |
vetti yatra na caivāyaṃ sthitaścalati tattvataḥ ||
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥
yaṃ labdhvā cāparaṃ lābhaṃ manyate nādhikaṃ tataḥ |
yasminsthito na duḥkhena guruṇāpi vicālyate ||
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥
taṃ vidyād duḥkhasaṃyogaviyogaṃ yogasaṃjñitam |
sa niścayena yoktavyo yogo’nirviṇṇacetasā ||
जखन योगक अभ्याससँ रोकल चित्त शांत भ’ जाइत अछि, आ मनुष्य आत्मा द्वारा आत्माकेँ देखि आत्मामे संतुष्ट होइत अछि; जखन ओ इंद्रियसँ परे, बुद्धिसँ ग्रहण करबा योग्य अनंत सुखकेँ जानि लैत अछि आ ओहि स्थितिमे सत्यसँ विचलित नहि होइत अछि; जकरा पाबि ओ ओहिसँ पैघ कोनो लाभ नहि मानैत अछि आ भारी दुःखोसँ विचलित नहि होइत अछि: तकरे दुःखक संयोगक वियोग रूप योग जानू। एहि योगक दृढ़ निश्चय आ उदास नहि होबऽ बला चित्तसँ अभ्यास करबाक चाही।
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥
saṅkalpaprabhavānkāmāṃstyaktvā sarvānaśeṣataḥ |
manasaivendriyagrāmaṃ viniyamya samantataḥ ||
शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥
śanaiḥ śanairuparamed buddhyā dhṛtigṛhītayā |
ātmasaṃsthaṃ manaḥ kṛtvā na kiñcidapi cintayet ||
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥
yato yato niścarati manaścañcalamasthiram |
tatastato niyamyaitadātmanyeva vaśaṃ nayet ||
संकल्पसँ उत्पन्न सभ कामनाकेँ पूर्णतः त्यागि, मनहिसँ इंद्रियक समूहकेँ चारू कातसँ नीकसँ रोकि, धीरे-धीरे धैर्ययुक्त बुद्धिसँ उपरतिकेँ प्राप्त हो; मनकेँ आत्मामे स्थित क’ क’ किछुओ चिंतन नहि करय। ई चंचल आ अस्थिर मन जतए-जतए भटकैत अछि, ततए-ततएसँ रोकि ओकरा आत्माक वशमे आनय।
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥
praśāntamanasaṃ hyenaṃ yoginaṃ sukhamuttamam |
upaiti śāntarajasaṃ brahmabhūtamakalmaṣam ||
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥
yuñjannevaṃ sadātmānaṃ yogī vigatakalmaṣaḥ |
sukhena brahmasaṃsparśamatyantaṃ sukhamaśnute ||
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥
sarvabhūtasthamātmānaṃ sarvabhūtāni cātmani |
īkṣate yogayuktātmā sarvatra samadarśanaḥ ||
जकर मन शांत अछि, रजोगुण शांत अछि, जे निष्पाप आ ब्रह्मभूत भ’ गेल अछि, ओहि योगीकेँ उत्तम सुख प्राप्त होइत अछि। एहि प्रकारेँ सदिखन आत्माकेँ योगमे लगबैत निष्पाप योगी सहजहि ब्रह्मक संपर्क रूप अनंत सुखक अनुभव करैत अछि। योगसँ युक्त आत्मा बला सर्वत्र समदर्शी भ’ अपनाकेँ सभ प्राणीमे आ सभ प्राणीकेँ अपनामे देखैत अछि।
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥
yo māṃ paśyati sarvatra sarvaṃ ca mayi paśyati |
tasyāhaṃ na praṇaśyāmi sa ca me na praṇaśyati ||
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥
sarvabhūtasthitaṃ yo māṃ bhajatyekatvamāsthitaḥ |
sarvathā vartamāno’pi sa yogī mayi vartate ||
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥
ātmaupamyena sarvatra samaṃ paśyati yo’rjuna |
sukhaṃ vā yadi vā duḥkhaṃ sa yogī paramo mataḥ ||
जे हमरा सर्वत्र देखैत अछि आ सभकेँ हमरामे देखैत अछि, ओकरा लेल हम अदृश्य नहि होइत छी आ ओ हमरा लेल अदृश्य नहि होइत अछि। जे एकत्वमे स्थित भ’ सभ प्राणीमे स्थित हमरा भजैत अछि, से योगी सभ तरहेँ बरतितो हमरहि मे बरतैत अछि। जे अपन उपमासँ सर्वत्र सुख हो वा दुःख, तकरा सम देखैत अछि, से परम योगी मानल गेल अछि।
अर्जुन उवाच
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥
arjuna uvāca
yo’yaṃ yogastvayā proktaḥ sāmyena madhusūdana |
etasyāhaṃ na paśyāmi cañcalatvātsthitiṃ sthirām ||
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥
cañcalaṃ hi manaḥ kṛṣṇa pramāthi balavad dṛḍham |
tasyāhaṃ nigrahaṃ manye vāyoriva suduṣkaram ||
अर्जुन कहैत छथि: अहाँ जे ई समताक योग बतओलहुँ, मनक चंचलताक कारणेँ हम एकर स्थिर स्थिति नहि देखैत छी। हे कृष्ण, मन चंचल, मथऽ बला, बलवान आ हठी अछि; एकरा रोकब हम वायुकेँ रोकब जकाँ अत्यंत कठिन मानैत छी।
श्रीभगवानुवाच
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥
śrībhagavānuvāca
asaṃśayaṃ mahābāho mano durnigrahaṃ calam |
abhyāsena tu kaunteya vairāgyeṇa ca gṛhyate ||
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥
asaṃyatātmanā yogo duṣprāpa iti me matiḥ |
vaśyātmanā tu yatatā śakyo’vāptumupāyataḥ ||
कृष्ण उत्तर दैत छथि: हे महाबाहो, निःसंदेह मन चंचल आ कठिनाइसँ वशमे होबऽ बला अछि, मुदा अभ्यास आ वैराग्यसँ ई वशमे कएल जा सकैत अछि। जकर मन वशमे नहि अछि, तकरा लेल योग प्राप्त करब कठिन अछि, एहन हमर मत अछि; मुदा प्रयत्न करऽ बला, मनकेँ वशमे रखनिहार उचित उपायसँ ओकरा पाबि सकैत अछि।
अर्जुन उवाच
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥
arjuna uvāca
ayatiḥ śraddhayopeto yogāccalitamānasaḥ |
aprāpya yogasaṃsiddhiṃ kāṃ gatiṃ kṛṣṇa gacchati ||
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥
kaccinnobhayavibhraṣṭaśchinnābhramiva naśyati |
apratiṣṭho mahābāho vimūḍho brahmaṇaḥ pathi ||
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥
etanme saṃśayaṃ kṛṣṇa chettumarhasyaśeṣataḥ |
tvadanyaḥ saṃśayasyāsya chettā na hyupapadyate ||
अर्जुन पुछैत छथि: जे श्रद्धासँ युक्त अछि मुदा प्रयत्न नहि करैत अछि, जकर मन योगसँ विचलित भ’ गेल अछि आ जे योगक सिद्धि नहि पाओल, हे कृष्ण, से कोन गति जाइत अछि? की ओ छिन्न-भिन्न मेघ जकाँ दुनू कातसँ भ्रष्ट भ’ क’, निराधार आ ब्रह्मक मार्गमे मोहित भ’ नष्ट नहि भ’ जाइत अछि? हे कृष्ण, हमर एहि संशयकेँ पूर्ण रूपसँ दूर करू; अहाँक अतिरिक्त केओ एकरा दूर करऽ बला नहि अछि।
श्रीभगवानुवाच
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति ॥
śrībhagavānuvāca
pārtha naiveha nāmutra vināśastasya vidyate |
na hi kalyāṇakṛtkaścid durgatiṃ tāta gacchati ||
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥
prāpya puṇyakṛtāṃ lokānuṣitvā śāśvatīḥ samāḥ |
śucīnāṃ śrīmatāṃ gehe yogabhraṣṭo’bhijāyate ||
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥
athavā yogināmeva kule bhavati dhīmatām |
etaddhi durlabhataraṃ loke janma yadīdṛśam ||
कृष्ण उत्तर दैत छथि: हे पार्थ, ओकर ने एहि लोकमे नाश होइत अछि, ने परलोकमे; किएक तँ कल्याणकारी कर्म करऽ बला केओ दुर्गतिकेँ प्राप्त नहि होइत अछि। योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यात्मा सभक लोक पाबि ओतए बहुत वर्ष धरि रहि, पवित्र आ श्रीमान लोकक घरमे जन्म लैत अछि, अथवा बुद्धिमान योगी सभक कुलमे जन्म लैत अछि; एहन जन्म एहि लोकमे अत्यंत दुर्लभ अछि।
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥
tatra taṃ buddhisaṃyogaṃ labhate paurvadehikam |
yatate ca tato bhūyaḥ saṃsiddhau kurunandana ||
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः ।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥
pūrvābhyāsena tenaiva hriyate hyavaśo’pi saḥ |
jijñāsurapi yogasya śabdabrahmātivartate ||
ओतए ओ पूर्व जन्मक बुद्धिक संयोग पाबि लैत अछि आ ओहिसँ फेर सिद्धिक लेल बेसी प्रयत्न करैत अछि। ओहि पूर्व अभ्याससँ ओ अवश भ’ क’ सेहो घिचा जाइत अछि; योगक जिज्ञासुओ शब्दब्रह्म, अर्थात् वैदिक कर्मकांडसँ आगाँ निकलि जाइत अछि।
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥
prayatnādyatamānastu yogī saṃśuddhakilbiṣaḥ |
anekajanmasaṃsiddhastato yāti parāṃ gatim ||
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥
tapasvibhyo’dhiko yogī jñānibhyo’pi mato’dhikaḥ |
karmibhyaścādhiko yogī tasmādyogī bhavārjuna ||
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥
yogināmapi sarveṣāṃ madgatenāntarātmanā |
śraddhāvānbhajate yo māṃ sa me yuktatamo mataḥ ||
प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करऽ बला योगी, पापसँ शुद्ध भ’ क’ आ अनेक जन्ममे सिद्ध भ’ क’, परम गति प्राप्त करैत अछि। योगी तपस्वीसँ श्रेष्ठ अछि, ज्ञानी सभसँ सेहो श्रेष्ठ मानल गेल अछि आ कर्मकांडी सभसँ सेहो श्रेष्ठ अछि; तेँ हे अर्जुन, अहाँ योगी बनू। आ सभ योगीमे सेहो जे श्रद्धावान हमरामे लागल अंतरात्मासँ हमरा भजैत अछि, से हमर मतमे सभसँ उत्तम योगी अछि।
श्लोक परंपरागत संस्कृत पाठ अछि। व्याख्या मौलिक सारांश अछि, कोनो विशेष अनुवादकक शब्द नहि। ज्योतिष मार्गदर्शिका भक्ति आ चिंतनक अभ्यास अछि, भविष्यवाणी नहि आ ने पेशेवर सलाहक विकल्प।