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अर्जुनविषादयोग

अर्जुनविषादयोगः · Arjuna-viṣāda-yoga · 47 श्लोक

अपना जुग के सबसे बड़ धनुर्धर अर्जुन दू गो सेना के बीच में खड़ा होके ठिठक जालें। ई अध्याय ओह घड़ी के कथा हवे जब डर, सोक आ भरम करम के असंभव बना देला। जिनगी में लगभग हर आदमी एह घड़ी से गुजरेला, आ गीता ओही के नाँव देके सुरू होखेले।

ज्योतिष पढ़े के मार्गदर्शिका
ग्रहशनिराहु
परंपरा से एह बेरा पढ़ल जालाशनि के गोचर (साढ़ेसाती)राहु महादशा

परंपरा में एकरा शनि आ राहु से जोड़ल जाला: साढ़ेसाती भा राहु महादशा के भारी, डेरवावे वाला बेरा में, जब करतब बोझ लागेला, मन उलझ जाला आ सब कुछ दाँव पर लागल लउकेला। एह अध्याय के पढ़ल ओह हालत के ईमानदारी से पहचानल के तरीका हवे। ई चिंतन के अभ्यास हवे, भविष्यवाणी ना।

संस्कृत पाठ एगो एआई आवाज में पढ़ल गइल बा।
1.1

धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥

dhṛtarāṣṭra uvāca
dharmakṣetre kurukṣetre samavetā yuyutsavaḥ |
māmakāḥ pāṇḍavāścaiva kimakurvata sañjaya ||

भावार्थ · श्लोक 1

आन्हर राजा धृतराष्ट्र आपन मंत्री संजय से पूछेलन कि कुरुक्षेत्र के पवित्र भूमि पर लड़ाई खातिर जुटल उनकर बेटा लोग आ पांडव का करत बाड़न। गीता के पहिलके सबद लड़ाई के मैदान के धर्मक्षेत्र कहेला।

1.2

सञ्जय उवाच
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥

sañjaya uvāca
dṛṣṭvā tu pāṇḍavānīkaṃ vyūḍhaṃ duryodhanastadā |
ācāryamupasaṃgamya rājā vacanamabravīt ||

1.3

पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥

paśyaitāṃ pāṇḍuputrāṇāmācārya mahatīṃ camūm |
vyūḍhāṃ drupadaputreṇa tava śiṣyeṇa dhīmatā ||

भावार्थ · श्लोक 2–3

दुर्योधन पांडव लोग के व्यूह में खड़ा सेना देख के आपन गुरु द्रोणाचार्य लगे जालन। उ द्रुपद के बेटा धृष्टद्युम्न के सजावल बड़हन सेना के ओर इसारा करेलन, जे द्रोण के ही पुरान चेला हवे।

1.4

अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥

atra śūrā maheṣvāsā bhīmārjunasamā yudhi |
yuyudhāno virāṭaśca drupadaśca mahārathaḥ ||

1.5

धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुंगवः ॥

dhṛṣṭaketuścekitānaḥ kāśirājaśca vīryavān |
purujitkuntibhojaśca śaibyaśca narapuṃgavaḥ ||

1.6

युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥

yudhāmanyuśca vikrānta uttamaujāśca vīryavān |
saubhadro draupadeyāśca sarva eva mahārathāḥ ||

भावार्थ · श्लोक 4–6

उ पांडव पक्ष के महारथी लोग के गिनती करेलन, जे लड़ाई में भीम आ अर्जुन के बराबर बाड़न: युयुधान, विराट, द्रुपद, धृष्टकेतु, काशिराज, युधामन्यु, उत्तमौजा आ सुभद्रा आ द्रौपदी के बेटा लोग।

1.7

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥

asmākaṃ tu viśiṣṭā ye tānnibodha dvijottama |
nāyakā mama sainyasya saṃjñārthaṃ tānbravīmi te ||

1.8

भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः ।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥

bhavānbhīṣmaśca karṇaśca kṛpaśca samitiñjayaḥ |
aśvatthāmā vikarṇaśca saumadattistathaiva ca ||

1.9

अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥

anye ca bahavaḥ śūrā madarthe tyaktajīvitāḥ |
nānāśastrapraharaṇāḥ sarve yuddhaviśāradāḥ ||

भावार्थ · श्लोक 7–9

फेर उ आपन पक्ष के सेनानायक लोग के नाँव लेलन: द्रोण, भीष्म, कर्ण, कृप, अश्वत्थामा, विकर्ण आ दोसर लोग। उ कहेलन कि कतने हथियार में माहिर बहुत से बीर उनका खातिर परान देवे के तइयार बाड़न।

1.10

अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥

aparyāptaṃ tadasmākaṃ balaṃ bhīṣmābhirakṣitam |
paryāptaṃ tvidameteṣāṃ balaṃ bhīmābhirakṣitam ||

1.11

अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥

ayaneṣu ca sarveṣu yathābhāgamavasthitāḥ |
bhīṣmamevābhirakṣantu bhavantaḥ sarva eva hi ||

भावार्थ · श्लोक 10–11

उ भीष्म के रखवारी वाला आपन सेना के ‘अपर्याप्त’ कहेलन, ई सबद ‘असीम’ आ ‘अधूरा’ दूनो मतलब दे सकेला, जवना में उनकर छिपल चिंता झलकेला; भीम के रखवारी वाला पांडव सेना के उ एकरा उलटा बतावेलन। उ सब सेनानायक लोग से कहेलन कि आपन-आपन जगह पर डटल रहे लोग आ सबसे बढ़ के भीष्म के रक्षा करे लोग।

1.12

तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ॥

tasya sañjanayanharṣaṃ kuruvṛddhaḥ pitāmahaḥ |
siṃhanādaṃ vinadyoccaiḥ śaṅkhaṃ dadhmau pratāpavān ||

1.13

ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥

tataḥ śaṅkhāśca bheryaśca paṇavānakagomukhāḥ |
sahasaivābhyahanyanta sa śabdastumulo’bhavat ||

भावार्थ · श्लोक 12–13

दुर्योधन के खुस करे खातिर बूढ़ पितामह भीष्म सिंह नियन गरज के संख बजावेलन। ओही घड़ी संख, नगाड़ा, ढोल आ नरसिंघा एके साथे बाज उठेला आ भयानक हल्ला मच जाला।

1.14

ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥

tataḥ śvetairhayairyukte mahati syandane sthitau |
mādhavaḥ pāṇḍavaścaiva divyau śaṅkhau pradadhmatuḥ ||

1.15

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥

pāñcajanyaṃ hṛṣīkeśo devadattaṃ dhanañjayaḥ |
pauṇḍraṃ dadhmau mahāśaṅkhaṃ bhīmakarmā vṛkodaraḥ ||

1.16

अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥

anantavijayaṃ rājā kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ |
nakulaḥ sahadevaśca sughoṣamaṇipuṣpakau ||

1.17

काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥

kāśyaśca parameṣvāsaḥ śikhaṇḍī ca mahārathaḥ |
dhṛṣṭadyumno virāṭaśca sātyakiścāparājitaḥ ||

1.18

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक् ॥

drupado draupadeyāśca sarvaśaḥ pṛthivīpate |
saubhadraśca mahābāhuḥ śaṅkhāndadhmuḥ pṛthakpṛthak ||

1.19

स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलोऽभ्यनुनादयन् ॥

sa ghoṣo dhārtarāṣṭrāṇāṃ hṛdayāni vyadārayat |
nabhaśca pṛthivīṃ caiva tumulo’bhyanunādayan ||

भावार्थ · श्लोक 14–19

उज्जर घोड़ा से जुतल सुंदर रथ पर बइठल कृष्ण आ अर्जुन आपन दिव्य संख बजा के जवाब देलन। फेर हर पांडव बीर आपन-आपन नाँव वाला संख बजावेला, जइसे पांचजन्य, देवदत्त, पौंड्र आ अनंतविजय, आ ओकर अवाज धृतराष्ट्र के बेटा लोग के छाती फाड़ देला।

1.20

अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ।
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ॥

atha vyavasthitāndṛṣṭvā dhārtarāṣṭrān kapidhvajaḥ |
pravṛtte śastrasampāte dhanurudyamya pāṇḍavaḥ |
hṛṣīkeśaṃ tadā vākyamidamāha mahīpate ||

1.21

अर्जुन उवाच
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥

arjuna uvāca
senayorubhayormadhye rathaṃ sthāpaya me’cyuta ||

भावार्थ · श्लोक 20–21

कौरव लोग के व्यूह में खड़ा देख के आ हथियार चले के बेरा आइल जान के कपिध्वज अर्जुन धनुष उठा के कृष्ण से कहेलन: अच्युत, हमार रथ के दूनो सेना के बीच में खड़ा करीं।

1.22

यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् ।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥

yāvadetānnirīkṣe’haṃ yoddhukāmānavasthitān |
kairmayā saha yoddhavyamasmin raṇasamudyame ||

1.23

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥

yotsyamānānavekṣe’haṃ ya ete’tra samāgatāḥ |
dhārtarāṣṭrasya durbuddheryuddhe priyacikīrṣavaḥ ||

भावार्थ · श्लोक 22–23

हम ओह लोग के नीमन से देखे के चाहतानी जे लड़ाई के इच्छा से खड़ा बा लोग, आ जिनका से हमरा लड़े के बा, जे दुर्बुद्धि धृतराष्ट्र-पुत्र के भला चाहे खातिर इहाँ जुटल बा लोग।

1.24

सञ्जय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥

sañjaya uvāca
evamukto hṛṣīkeśo guḍākeśena bhārata |
senayorubhayormadhye sthāpayitvā rathottamam ||

1.25

भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति ॥

bhīṣmadroṇapramukhataḥ sarveṣāṃ ca mahīkṣitām |
uvāca pārtha paśyaitānsamavetānkurūniti ||

भावार्थ · श्लोक 24–25

कृष्ण उत्तम रथ के दूनो सेना के बीच, भीष्म, द्रोण आ सब राजा लोग के सामने ले जाके खड़ा करेलन आ कहेलन: पार्थ, इहाँ जुटल एह कौरव लोग के देखीं।

1.26

तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान् ।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥

tatrāpaśyatsthitānpārthaḥ pitṝnatha pitāmahān |
ācāryānmātulānbhrātṝnputrānpautrānsakhīṃstathā ||

1.27

श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ॥

śvaśurānsuhṛdaścaiva senayorubhayorapi |
tānsamīkṣya sa kaunteyaḥ sarvānbandhūnavasthitān ||

भावार्थ · श्लोक 26–27

अर्जुन दूनो ओर खड़ा बाबूजी लोग, पितामह लोग, आचार्य लोग, मामा लोग, भाई लोग, बेटा लोग, पोता लोग, संघतिया लोग, ससुर लोग आ भला चाहे वाला लोग के देखेलन। जिनका से लड़े आइल बाड़न, उ उनकर आपन ही परिवार के लोग बा।

1.28

कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥

kṛpayā parayāviṣṭo viṣīdannidamabravīt |
arjuna uvāca
dṛṣṭvemaṃ svajanaṃ kṛṣṇa yuyutsuṃ samupasthitam ||

1.29

सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥

sīdanti mama gātrāṇi mukhaṃ ca pariśuṣyati |
vepathuśca śarīre me romaharṣaśca jāyate ||

भावार्थ · श्लोक 28–29

गहिर दया आ सोक से भरल अर्जुन बोलेलन। आपन सगा-संबंधी लोग के लड़ाई खातिर तइयार देख के उनकर अंग ढीला पड़ रहल बा, मुँह सूख रहल बा, देह काँप रहल बा आ रोआँ खड़ा हो रहल बा।

1.30

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥

gāṇḍīvaṃ sraṃsate hastāttvakcaiva paridahyate |
na ca śaknomyavasthātuṃ bhramatīva ca me manaḥ ||

भावार्थ · श्लोक 30

गांडीव धनुष हाथ से छूट रहल बा, चमड़ी जर रहल बा, उ खड़ा नइखन हो पावत आ मन घूमत लागत बा। ई नैतिक संकट पर देह के सच्चा प्रतिक्रिया हवे।

1.31

निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥

nimittāni ca paśyāmi viparītāni keśava |
na ca śreyo’nupaśyāmi hatvā svajanamāhave ||

1.32

न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ॥

na kāṅkṣe vijayaṃ kṛṣṇa na ca rājyaṃ sukhāni ca |
kiṃ no rājyena govinda kiṃ bhogairjīvitena vā ||

भावार्थ · श्लोक 31–32

अर्जुन अशुभ लछन देखेलन आ आपन लोग के मारे में कवनो भलाई ना पावेलन। उ कहेलन कि ना उनका जीत चाहीं, ना राज, ना सुख। गोविंद, अइसन राज, भोग भा जिनगी के का फायदा?

1.33

येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥

yeṣāmarthe kāṅkṣitaṃ no rājyaṃ bhogāḥ sukhāni ca |
ta ime’vasthitā yuddhe prāṇāṃstyaktvā dhanāni ca ||

1.34

आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥

ācāryāḥ pitaraḥ putrāstathaiva ca pitāmahāḥ |
mātulāḥ śvaśurāḥ pautrāḥ śyālāḥ sambandhinastathā ||

1.35

एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥

etānna hantumicchāmi ghnato’pi madhusūdana |
api trailokyarājyasya hetoḥ kiṃ nu mahīkṛte ||

भावार्थ · श्लोक 33–35

जिनका खातिर हमनी राज आ सुख चाहेनी जा, उहे लोग परान आ धन छोड़ के इहाँ खड़ा बा: आचार्य, बाबूजी, बेटा, पितामह, मामा, ससुर आ नाता-रिश्तेदार। मधुसूदन, उ लोग हमरा के मार देबो करे त हम उनका के मारे के ना चाहेनी, तीनों लोक के राज खातिर भी ना, फेर धरती के त बाते का।

1.36

निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ॥

nihatya dhārtarāṣṭrānnaḥ kā prītiḥ syājjanārdana |
pāpamevāśrayedasmānhatvaitānātatāyinaḥ ||

1.37

तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥

tasmānnārhā vayaṃ hantuṃ dhārtarāṣṭrānsvabāndhavān |
svajanaṃ hi kathaṃ hatvā sukhinaḥ syāma mādhava ||

भावार्थ · श्लोक 36–37

धृतराष्ट्र के बेटा लोग के मार के हमनी के का खुसी मिली? उ लोग आततायी बा, तबो उनका के मरले से पाप हमनिए के लागी। एहसे आपन भाई-बंधु के मारल हमनी खातिर ठीक नइखे; माधव, आपन लोग के मार के हमनी सुखी कइसे होखब जा?

1.38

यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥

yadyapyete na paśyanti lobhopahatacetasaḥ |
kulakṣayakṛtaṃ doṣaṃ mitradrohe ca pātakam ||

1.39

कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् ।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥

kathaṃ na jñeyamasmābhiḥ pāpādasmānnivartitum |
kulakṣayakṛtaṃ doṣaṃ prapaśyadbhirjanārdana ||

भावार्थ · श्लोक 38–39

लोभ से उनकर बुद्धि ढंकल बा, एहसे उ लोग कुल के नाश के दोष आ संघतिया से दगा के पाप ना देखेला। बाकिर हमनी त देख सकेनी जा, जनार्दन, त हमनी एह पाप से पीछे काहे ना हटीं जा?

1.40

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥

kulakṣaye praṇaśyanti kuladharmāḥ sanātanāḥ |
dharme naṣṭe kulaṃ kṛtsnamadharmo’bhibhavatyuta ||

1.41

अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः ॥

adharmābhibhavātkṛṣṇa praduṣyanti kulastriyaḥ |
strīṣu duṣṭāsu vārṣṇeya jāyate varṇasaṅkaraḥ ||

भावार्थ · श्लोक 40–41

अब अर्जुन आपन समय के नजर से बोलेलन: कुल के नास भइला पर ओकर सनातन परंपरा नास हो जाला; धर्म नास भइला पर पूरा कुल के अधर्म घेर लेला आ समाज के ताना-बाना करतब के उलझन में बिखर जाला।

1.42

सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥

saṅkaro narakāyaiva kulaghnānāṃ kulasya ca |
patanti pitaro hyeṣāṃ luptapiṇḍodakakriyāḥ ||

1.43

दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः ।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥

doṣairetaiḥ kulaghnānāṃ varṇasaṅkarakārakaiḥ |
utsādyante jātidharmāḥ kuladharmāśca śāśvatāḥ ||

1.44

उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥

utsannakuladharmāṇāṃ manuṣyāṇāṃ janārdana |
narake niyataṃ vāso bhavatītyanuśuśruma ||

भावार्थ · श्लोक 42–44

उ डेरालन कि ई भरम कुल के नाश करे वाला आ खुद कुल, दूनो के नीचे गिरावेला, आ पितर लोग आपन तर्पण-पिंडदान से बंचित हो जालें। उ कहेलन, हम सुनले बानी कि जिनकर कुलधर्म नास हो जाला, उनका लमहर बेरा तक नरक में रहे के पड़ेला।

1.45

अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥

aho bata mahatpāpaṃ kartuṃ vyavasitā vayam |
yadrājyasukhalobhena hantuṃ svajanamudyatāḥ ||

1.46

यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥

yadi māmapratīkāramaśastraṃ śastrapāṇayaḥ |
dhārtarāṣṭrā raṇe hanyustanme kṣemataraṃ bhavet ||

भावार्थ · श्लोक 45–46

हाय! कतना अचरज के बात बा कि राज-सुख के लोभ में हमनी आपन लोग के मारे के महापाप करे खातिर तइयार बानी जा! अगर हथियार वाला कौरव लोग हमरा जइसन निहत्था आ बिना रोकले वाला के लड़ाई में मार दी, त उ हमरा खातिर जादा भलाई वाला होई।

1.47

सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥

sañjaya uvāca
evamuktvārjunaḥ saṅkhye rathopastha upāviśat |
visṛjya saśaraṃ cāpaṃ śokasaṃvignamānasaḥ ||

भावार्थ · श्लोक 47

संजय कहेलन: एतना कह के अर्जुन धनुष-बान फेंक देलन आ सोक से बेकल मन से रथ के पिछला हिस्सा में बइठ गइलन। अध्याय 1 इहें खतम होला; कृष्ण के उपदेश अध्याय 2 से सुरू होला।

श्लोक परंपरागत संस्कृत पाठ हवे। व्याख्या अपने लिखल सारांश हई सन, कवनो खास अनुवादक के शब्द ना। ज्योतिष मार्गदर्शिका भक्ति आ चिंतन के अभ्यास हवे, भविष्यवाणी ना, आ पेशेवर सलाह के बदला में ना।