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कर्मयोग
कर्मयोगः · Karma-yoga · 43 श्लोक
अर्जुन उलझनमे छथि: जँ ज्ञान कर्मसँ श्रेष्ठ अछि तँ हुनका युद्ध किएक करबाक चाही? कृष्णक उत्तर कर्मयोगक हृदय अछि। केओ कर्म करब रोकि नहि सकैत अछि, तेँ असली प्रश्न ई अछि जे कर्म कोना कएल जाए: फलसँ सटल बिना, अर्पणक भावसँ, संसारक हितक लेल। अध्याय एहि जीवन-पद्धतिक शत्रु, काम आ क्रोधकेँ चिन्हबा आ ओकरा जीतबाक गप पर समाप्त होइत अछि।
परंपरामे एकरा मंगल, जे ऊर्जा आ कर्मक ग्रह अछि, आ धर्म तथा उद्देश्यक नवम भावसँ जोड़ल जाइत अछि। एकरा मंगल महादशामे पढ़ल जाइत अछि, जखन ऊर्जा आ बेचैनी बेसी हो, जाहिसँ क्रोध आ हड़बड़ी संघर्षक जगह स्थिर, निःस्वार्थ कर्ममे बदलि सकय। ई चिंतनक अभ्यास अछि, भविष्यवाणी नहि।
अर्जुन उवाच
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन ।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥
arjuna uvāca
jyāyasī cetkarmaṇaste matā buddhirjanārdana |
tatkiṃ karmaṇi ghore māṃ niyojayasi keśava ||
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥
vyāmiśreṇeva vākyena buddhiṃ mohayasīva me |
tadekaṃ vada niścitya yena śreyo’hamāpnuyām ||
अर्जुन कहैत छथि: जँ अहाँ कर्मसँ बुद्धिकेँ श्रेष्ठ मानैत छी, तँ हमरा एहि घोर कर्ममे किएक लगबैत छी? अहाँक मिश्रित वचनसँ हमर बुद्धि भ्रमित भ’ रहल अछि। हमरा निश्चित रूपसँ ओ एक मार्ग बताउ जाहिसँ हम परम कल्याण पाबि सकी।
श्रीभगवानुवाच
लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ।
ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥
śrībhagavānuvāca
loke’smin dvividhā niṣṭhā purā proktā mayānagha |
jñānayogena sāṅkhyānāṃ karmayogena yoginām ||
कृष्ण उत्तर दैत छथि: एहि लोकमे दू प्रकारक निष्ठा अछि, जेना हम पहिने कहने छी: ज्ञानी सभक लेल ज्ञानयोग आ कर्मशील लोकक लेल कर्मयोग।
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥
na karmaṇāmanārambhānnaiṣkarmyaṃ puruṣo’śnute |
na ca saṃnyasanādeva siddhiṃ samadhigacchati ||
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥
na hi kaścitkṣaṇamapi jātu tiṣṭhatyakarmakṛt |
kāryate hyavaśaḥ karma sarvaḥ prakṛtijairguṇaiḥ ||
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥
karmendriyāṇi saṃyamya ya āste manasā smaran |
indriyārthānvimūḍhātmā mithyācāraḥ sa ucyate ||
कर्म नहि केलासँ केओ कर्म-मुक्त नहि होइत अछि, आ मात्र त्यागसँ केओ सिद्धि नहि पबैत अछि। केओ क्षण भरिक लेलो बिना कर्म केने नहि रहि सकैत अछि, किएक तँ प्रकृतिक गुण सभसँ कर्म करबैत अछि। जे कर्मेंद्रियकेँ रोकि मनसँ विषयक चिंतन करैत रहैत अछि, से मूढ़ बुद्धि बला मिथ्याचारी कहबैत अछि।
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥
yastvindriyāṇi manasā niyamyārabhate’rjuna |
karmendriyaiḥ karmayogamasaktaḥ sa viśiṣyate ||
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥
niyataṃ kuru karma tvaṃ karma jyāyo hyakarmaṇaḥ |
śarīrayātrāpi ca te na prasiddhyedakarmaṇaḥ ||
मुदा जे मनसँ इंद्रियकेँ वशमे क’ क’ अनासक्त भ’ कर्मेंद्रियसँ कर्मयोगक आचरण करैत अछि, से श्रेष्ठ अछि। अहाँ अपन नियत कर्म करू, किएक तँ कर्म नहि केलासँ कर्म करब श्रेष्ठ अछि; कर्मक बिना तँ शरीरक निर्वाहो नहि भ’ सकैत अछि।
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥
yajñārthātkarmaṇo’nyatra loko’yaṃ karmabandhanaḥ |
tadarthaṃ karma kaunteya muktasaṅgaḥ samācara ||
यज्ञक निमित्त कएल गेल कर्मक अतिरिक्त आन कर्म एहि लोककेँ बन्हनिहार अछि। तेँ हे अर्जुन, आसक्ति छोड़ि ओकरे लेल कर्म करू।
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥
sahayajñāḥ prajāḥ sṛṣṭvā purovāca prajāpatiḥ |
anena prasaviṣyadhvameṣa vo’stviṣṭakāmadhuk ||
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥
devānbhāvayatānena te devā bhāvayantu vaḥ |
parasparaṃ bhāvayantaḥ śreyaḥ paramavāpsyatha ||
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥
iṣṭānbhogānhi vo devā dāsyante yajñabhāvitāḥ |
tairdattānapradāyaibhyo yo bhuṅkte stena eva saḥ ||
सृष्टिक आरंभमे प्रजापति यज्ञक संग प्रजाकेँ रचि क’ कहलनि: एहिसँ अहाँ सभ बढ़ू, ई अहाँ सभक इच्छित कामना सभ देनिहार होअय। एकर द्वारा देवता सभकेँ पुष्ट करू आ ओ देवता सभ अहाँ सभकेँ पुष्ट करथि; एहि तरहेँ परस्पर सहयोगसँ अहाँ सभ परम कल्याण पाएब। यज्ञसँ पुष्ट देवता अहाँ सभकेँ इच्छित भोग देताह; जे हुनकर देल भोगकेँ हुनका देने बिना भोगैत अछि, से चोर अछि।
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥
yajñaśiṣṭāśinaḥ santo mucyante sarvakilbiṣaiḥ |
bhuñjate te tvaghaṃ pāpā ye pacantyātmakāraṇāt ||
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः ।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥
annādbhavanti bhūtāni parjanyādannasambhavaḥ |
yajñādbhavati parjanyo yajñaḥ karmasamudbhavaḥ ||
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥
karma brahmodbhavaṃ viddhi brahmākṣarasamudbhavam |
tasmātsarvagataṃ brahma nityaṃ yajñe pratiṣṭhitam ||
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥
evaṃ pravartitaṃ cakraṃ nānuvartayatīha yaḥ |
aghāyurindriyārāmo moghaṃ pārtha sa jīvati ||
यज्ञसँ बचल अन्न खाएबला श्रेष्ठ लोक सभ पापसँ मुक्त भ’ जाइत छथि; जे मात्र अपना लेल पकबैत अछि, से पापे खाइत अछि। प्राणी अन्नसँ होइत अछि, अन्न वर्षासँ, वर्षा यज्ञसँ आ यज्ञ कर्मसँ उत्पन्न होइत अछि। कर्मकेँ वेदसँ उत्पन्न आ वेदकेँ अक्षर परब्रह्मसँ उत्पन्न जानू; तेँ सर्वव्यापी ब्रह्म सदिखन यज्ञमे प्रतिष्ठित अछि। जे एहि प्रकारेँ चलाओल गेल चक्रक अनुसरण नहि करैत अछि, से पापमय जीवन बला, इंद्रियमे रमनिहार व्यक्ति व्यर्थ जीबैत अछि।
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥
yastvātmaratireva syādātmatṛptaśca mānavaḥ |
ātmanyeva ca santuṣṭastasya kāryaṃ na vidyate ||
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥
naiva tasya kṛtenārtho nākṛteneha kaścana |
na cāsya sarvabhūteṣu kaścidarthavyapāśrayaḥ ||
मुदा जे मनुष्य आत्मामे रमण करऽ बला, आत्मामे तृप्त आ आत्मामे संतुष्ट अछि, तकरा लेल कोनो कर्तव्य नहि रहि जाइत अछि। ओकरा एहि लोकमे ने कर्म केलासँ कोनो प्रयोजन अछि, ने नहि केलासँ, आ सभ प्राणीमे केकरो पर ओ कोनो प्रयोजनक लेल निर्भर नहि अछि।
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥
tasmādasaktaḥ satataṃ kāryaṃ karma samācara |
asakto hyācarankarma paramāpnoti pūruṣaḥ ||
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ॥
karmaṇaiva hi saṃsiddhimāsthitā janakādayaḥ |
lokasaṃgrahamevāpi sampaśyankartumarhasi ||
तेँ आसक्तिक बिना सदिखन अपन कर्तव्य कर्म नीकसँ करू, किएक तँ अनासक्त भ’ कर्म करऽ बला परमकेँ प्राप्त करैत अछि। जनक आदि ज्ञानी सेहो कर्मसँ सिद्धि प्राप्त कएलनि। लोकसंग्रह, अर्थात् संसारक हितकेँ देखितो अहाँकेँ कर्म करबे उचित अछि।
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥
yadyadācarati śreṣṭhastattadevetaro janaḥ |
sa yatpramāṇaṃ kurute lokastadanuvartate ||
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन ।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥
na me pārthāsti kartavyaṃ triṣu lokeṣu kiñcana |
nānavāptamavāptavyaṃ varta eva ca karmaṇi ||
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥
yadi hyahaṃ na varteyaṃ jātu karmaṇyatandritaḥ |
mama vartmānuvartante manuṣyāḥ pārtha sarvaśaḥ ||
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥
utsīdeyurime lokā na kuryāṃ karma cedaham |
saṅkarasya ca kartā syāmupahanyāmimāḥ prajāḥ ||
श्रेष्ठ पुरुष जे-जे आचरण करैत छथि, आन लोक सेहो ओहने करैत अछि; ओ जे प्रमाण स्थापित करैत छथि, लोक ओकरे अनुसरण करैत अछि। कृष्ण कहैत छथि: पार्थ, तीनू लोकमे हमर कोनो कर्तव्य नहि अछि आ कोनो अप्राप्त वस्तु पाबऽ बला नहि अछि, तैयो हम कर्ममे लागल रहैत छी। जँ हम सावधान भ’ कर्म नहि करी, तँ लोक हमरे मार्गक अनुसरण करत; हम कर्म नहि करी तँ ई लोक नष्ट भ’ जाएत, आ हम अव्यवस्था तथा प्रजाक विनाशक कारण बनब।
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥
saktāḥ karmaṇyavidvāṃso yathā kurvanti bhārata |
kuryādvidvāṃstathāsaktaścikīrṣurlokasaṃgraham ||
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥
na buddhibhedaṃ janayedajñānāṃ karmasaṅginām |
joṣayetsarvakarmāṇi vidvānyuktaḥ samācaran ||
जेना अज्ञानी लोक आसक्त भ’ कर्म करैत अछि, तहिना विद्वानकेँ आसक्ति छोड़ि लोकसंग्रहक इच्छासँ कर्म करबाक चाही। ज्ञानीकेँ कर्ममे आसक्त अज्ञानी सभक बुद्धिमे भ्रम नहि देबाक चाही, बल्कि स्वयं नीकसँ कर्म करैत हुनको सभसँ करबाक चाही।
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥
prakṛteḥ kriyamāṇāni guṇaiḥ karmāṇi sarvaśaḥ |
ahaṅkāravimūḍhātmā kartāhamiti manyate ||
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥
tattvavittu mahābāho guṇakarmavibhāgayoḥ |
guṇā guṇeṣu vartanta iti matvā na sajjate ||
प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥
prakṛterguṇasammūḍhāḥ sajjante guṇakarmasu |
tānakṛtsnavido mandānkṛtsnavinna vicālayet ||
सभ कर्म प्रकृतिक गुण द्वारा कएल जाइत अछि, मुदा अहंकारसँ मोहित मन बला मनुष्य सोचैत अछि, ‘हम कर्ता छी।’ जे गुण आ कर्मक विभागक तत्त्व जनैत अछि, आ बुझैत अछि जे गुणे गुणमे बरतैत अछि, से आसक्त नहि होइत अछि। जे प्रकृतिक गुणसँ मोहित छथि, से गुणक कर्ममे आसक्त रहैत छथि; पूर्ण जाननिहारकेँ ओहि मंदबुद्धि, अपूर्ण जाननिहार सभकेँ विचलित नहि करबाक चाही।
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥
mayi sarvāṇi karmāṇi saṃnyasyādhyātmacetasā |
nirāśīrnirmamo bhūtvā yudhyasva vigatajvaraḥ ||
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥
ye me matamidaṃ nityamanutiṣṭhanti mānavāḥ |
śraddhāvanto’nasūyanto mucyante te’pi karmabhiḥ ||
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥
ye tvetadabhyasūyanto nānutiṣṭhanti me matam |
sarvajñānavimūḍhāṃstānviddhi naṣṭānacetasaḥ ||
अपन सभ कर्म हमरामे अर्पण क’ क’, अध्यात्म-चित्त भ’ क’, आशा आ ममतासँ रहित भ’ क’, संताप-रहित भ’ युद्ध करू। जे मनुष्य श्रद्धायुक्त आ दोष-दृष्टिसँ रहित भ’ हमर एहि मतक सदिखन पालन करैत अछि, ओहो कर्मबंधनसँ मुक्त भ’ जाइत अछि। मुदा जे हमर एहि मतक निंदा क’ क’ एकर पालन नहि करैत अछि, तकरा सभ ज्ञानमे मोहित आ नष्ट भेल, विवेकहीन जानू।
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥
sadṛśaṃ ceṣṭate svasyāḥ prakṛterjñānavānapi |
prakṛtiṃ yānti bhūtāni nigrahaḥ kiṃ kariṣyati ||
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥
indriyasyendriyasyārthe rāgadveṣau vyavasthitau |
tayorna vaśamāgacchettau hyasya paripanthinau ||
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥
śreyānsvadharmo viguṇaḥ paradharmātsvanuṣṭhitāt |
svadharme nidhanaṃ śreyaḥ paradharmo bhayāvahaḥ ||
ज्ञानियो अपन प्रकृतिक अनुसार चेष्टा करैत अछि; सभ प्राणी अपन प्रकृतिक अनुसरण करैत अछि, तखन जबरदस्ती रोकलासँ की हएत? प्रत्येक इंद्रियक विषयमे राग आ द्वेष स्थित अछि; मनुष्यकेँ हुनका सभक वशमे नहि होएबाक चाही, किएक तँ ओ सभ ओकर मार्गक शत्रु अछि। आनक धर्मक नीकसँ पालन केलासँ अपन धर्म, गुण-रहित भेलो पर, श्रेष्ठ अछि; अपन धर्ममे मरनहुँ कल्याणकारी अछि, आनक धर्म भय देनिहार अछि।
अर्जुन उवाच
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः ।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥
arjuna uvāca
atha kena prayukto’yaṃ pāpaṃ carati pūruṣaḥ |
anicchannapi vārṣṇeya balādiva niyojitaḥ ||
अर्जुन पुछैत छथि: मनुष्य नहि चाहितो, मानू बलपूर्वक लगाओल गेल, केकरासँ प्रेरित भ’ पापक आचरण करैत अछि?
श्रीभगवानुवाच
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥
śrībhagavānuvāca
kāma eṣa krodha eṣa rajoguṇasamudbhavaḥ |
mahāśano mahāpāpmā viddhyenamiha vairiṇam ||
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च ।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥
dhūmenāvriyate vahniryathādarśo malena ca |
yatholbenāvṛto garbhastathā tenedamāvṛtam ||
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥
āvṛtaṃ jñānametena jñānino nityavairiṇā |
kāmarūpeṇa kaunteya duṣpūreṇānalena ca ||
कृष्ण उत्तर दैत छथि: ई काम अछि, ई क्रोध अछि, जे रजोगुणसँ उत्पन्न होइत अछि; ई बहुत खाइबला आ महापापी अछि, एकरे एतए शत्रु जानू। जेना धुँआसँ आगि, मैलसँ दर्पण आ जेरसँ गर्भ झाँपल रहैत अछि, तहिना एहि कामसँ ज्ञान झाँपल रहैत अछि। हे अर्जुन, कहियो तृप्त नहि होबऽ बला कामरूपी आगिसँ, ज्ञानी सभक एहि नित्य शत्रुसँ ज्ञान झाँपल अछि।
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥
indriyāṇi mano buddhirasyādhiṣṭhānamucyate |
etairvimohayatyeṣa jñānamāvṛtya dehinam ||
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥
tasmāttvamindriyāṇyādau niyamya bharatarṣabha |
pāpmānaṃ prajahi hyenaṃ jñānavijñānanāśanam ||
इंद्रिय, मन आ बुद्धि एकर निवास-स्थान कहल गेल अछि; एहि सभसँ ई ज्ञानकेँ झाँपि देहधारीकेँ मोहित करैत अछि। तेँ हे अर्जुन, पहिने इंद्रियकेँ वशमे क’ क’ ज्ञान आ विज्ञानक नाश करऽ बला एहि पापरूप कामकेँ मारि दिअ।
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥
indriyāṇi parāṇyāhurindriyebhyaḥ paraṃ manaḥ |
manasastu parā buddhiryo buddheḥ paratastu saḥ ||
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥
evaṃ buddheḥ paraṃ buddhvā saṃstabhyātmānamātmanā |
jahi śatruṃ mahābāho kāmarūpaṃ durāsadam ||
इंद्रियकेँ श्रेष्ठ कहल गेल अछि; इंद्रियसँ परे मन अछि, मनसँ परे बुद्धि अछि, आ जे बुद्धिसँ सेहो परे अछि, से आत्मा अछि। एहि प्रकारेँ बुद्धिसँ परे आत्माकेँ जानि, अपनाकेँ आत्मबलसँ स्थिर क’ क’, हे महाबाहो, एहि कठिनाइसँ जीतल जाए बला कामरूपी शत्रुकेँ मारि दिअ।
श्लोक परंपरागत संस्कृत पाठ अछि। व्याख्या मौलिक सारांश अछि, कोनो विशेष अनुवादकक शब्द नहि। ज्योतिष मार्गदर्शिका भक्ति आ चिंतनक अभ्यास अछि, भविष्यवाणी नहि आ ने पेशेवर सलाहक विकल्प।